सरस्वती पूजा क्यों होती है, और उस दिन घर में क्या होता है
रीति रिवाज 18 जनवरी 2026
सरस्वती पूजा माघ मास की शुक्ल पंचमी को होती है, जिसे बसंत पंचमी भी कहते हैं। यह दिन जाड़े के अंत और बसंत के आरंभ का माना जाता है, इसीलिए इस दिन पीले रंग का महत्व है।
मिथिला में यह पर्व विशेष रूप से विद्यार्थियों का है। सरस्वती विद्या, भाषा और कला की देवी मानी जाती हैं। इस दिन घर की किताबें, कलम, कॉपी और यदि कोई वाद्ययंत्र है तो वह भी पूजा के स्थान पर रख दिया जाता है।
इसी से जुड़ी वह बात है जो बच्चों को सबसे अटपटी लगती है: इस दिन पढ़ा नहीं जाता। कारण सीधा है। जिस चीज़ की पूजा हो रही हो, उसे उस दिन काम में नहीं लाया जाता। किताब उस दिन औज़ार नहीं रहती।
घर में तैयारी एक दिन पहले शुरू होती है। स्थान की सफ़ाई होती है, ज़मीन पर अरिपन बनाया जाता है, कलश रखा जाता है और पीले फूल चढ़ाए जाते हैं। प्रसाद में कई घरों में बेर, लाई और बूँदी रखी जाती है, क्योंकि ये उसी मौसम की चीज़ें हैं।
दिल्ली में परिषद् पंडाल की व्यवस्था इसलिए करती है कि जिन परिवारों के घर में जगह नहीं है, वे भी पूजा में शामिल हो सकें। पंडाल में पूजा के बाद प्रसाद और सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं।
यदि घर का बच्चा पूछे कि यह सब क्यों हो रहा है, तो उत्तर इतना ही है: वर्ष में एक दिन पढ़ाई को औज़ार की तरह नहीं, आदर की तरह देखा जाता है। बाकी सब उसी के आसपास की व्यवस्था है।
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