संस्था का परिचय
मिथिला एकता विकास परिषद् एक पंजीकृत संस्था है और 2004 से काम कर रही है।
समाज की सेवा, समुदाय की मज़बूती, संस्कृति की रक्षा
परिषद् कैसे बनी और आज क्या करती है
परिषद् की शुरुआत दिल्ली में रहने वाले मिथिला के कुछ लोगों ने मिलकर की थी। उद्देश्य सीधा था: आसपास के परिवारों के काम आना और मिथिला की परंपरा को बनाए रखना।
परिषद् हर वर्ष दो पर्वों की व्यवस्था करती है: माघ में सरस्वती पूजा और कार्तिक में छठ पूजा। दोनों पर्व बराबर हैं। समय के साथ रक्तदान शिविर, स्वास्थ्य जाँच, वृक्षारोपण और ज़रूरतमंद परिवारों की सहायता का काम भी इनके साथ जुड़ता गया।
काम सदस्यों और आसपास के लोगों की सहयोग राशि से चलता है। हर राशि की रसीद बनती है। हिसाब प्रबंध समिति रखती है और वर्ष का लेखा वार्षिक बैठक में सदस्यों के सामने रखा जाता है।
शुरुआत के वर्षों का लिखा हुआ ब्योरा कार्यालय के पास बहुत कम है। इस पन्ने पर लिखा स्थापना वर्ष कार्यालय के मूल काग़ज़ों से मिलाया जाना बाकी है। परिषद् बनाने वालों के नाम और पहले आयोजन की जगह अभी दर्ज नहीं है: {{VERIFY: संस्थापक सदस्यों के नाम}}, {{VERIFY: पहले पंडाल या घाट का स्थान}}। जिन परिवारों के पास उन वर्षों के चित्र, निमंत्रण या काग़ज़ हों, वे कार्यालय को दें।
दिल्ली सरकार द्वारा प्रमाणित
परिषद् दिल्ली में पंजीकृत संस्था है और दिल्ली सरकार द्वारा दिल्ली क्षेत्र की प्रतिष्ठित संस्था के रूप में प्रमाणित है। संख्या, तिथि और प्रमाणपत्र की प्रति कार्यालय के मूल कागज़ों से ही यहाँ दर्ज होती है।
- पंजीकरण संख्या
- {{VERIFY: पंजीकरण संख्या}}
- प्रमाणपत्र संख्या
- {{VERIFY: प्रमाणपत्र संख्या}}
- प्रमाणन तिथि
- {{VERIFY: प्रमाणन तिथि}}
- स्थापना वर्ष
- 2004
परिषद् के दो पर्व
सरस्वती पूजा, बच्चों की पढ़ाई का पर्व, बसंत पंचमी को पंडाल में होती है। छठ पूजा कार्तिक में चार दिन का व्रत है, जिसमें घाट पर डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य, यानी जल, चढ़ाया जाता है। दोनों की व्यवस्था परिषद् करती है, दोनों बराबर हैं।
परिषद् का काम
परिषद् का काम संगठन के विकास, सदस्यता के विस्तार, समाज कल्याण, संस्कृति और पर्व, पर्यावरण और डिजिटल व्यवस्था में चलता है। हर क्षेत्र में क्या किया जाता है और क्या अभी योजना में है, यह गतिविधि के पन्ने पर लिखा है।
परिषद् के मूल्य
- ईमानदारी
- एकता
- पारदर्शिता
- सम्मान
- करुणा
- सबको साथ लेना
- जवाबदेही
- स्वयंसेवा
- सांस्कृतिक विरासत
- पर्यावरण संरक्षण
2029 तक का लक्ष्य
ये 2026 से 2029 तक के लिए बनी परिषद् की अपनी योजना के लक्ष्य हैं, यानी आगे का काम, हो चुका काम नहीं।
अपनी ज़मीन लेकर परिषद् का स्थायी कार्यालय बनाना।
संस्था का कामकाज ऐसा रखना कि हर निर्णय और हर हिसाब सदस्यों के सामने रहे।
सक्रिय सदस्यों और स्वयंसेवकों की संख्या एक हज़ार तक पहुँचाना।
स्वास्थ्य शिविर, पढ़ाई में सहायता, आपदा राहत और ज़रूरतमंद परिवारों की सहायता का काम बढ़ाना।
सरस्वती पूजा, छठ पूजा और दूसरे सांस्कृतिक कार्यक्रम जारी रखना और बढ़ाना।
वृक्षारोपण, स्वच्छता अभियान और पर्यावरण की रक्षा का काम बढ़ाना।
सदस्यता और स्वयंसेवा के लिए वेबसाइट और मोबाइल ऐप बनाना, जिसकी शुरुआत इस वेबसाइट से हो चुकी है।
लेखा और दस्तावेज़
परिषद् अपना वार्षिक लेखा, नियमावली, पंजीकरण प्रमाणपत्र, कार्यवृत्त और स्मारिका इसी वेबसाइट पर प्रकाशित करती है। जो काग़ज़ अभी अपलोड नहीं हुआ, उसके बारे में वह पन्ना साफ़ कहता है कि अभी नहीं है।
प्रबंध समिति
प्रबंध समिति हर वर्ष चुनी जाती है। आयोजन, हिसाब और सदस्यता से जुड़े निर्णय समिति ही लेती है। इस वर्ष की समिति के नाम और पद कार्यालय की पुष्टि के बाद समिति के पन्ने पर दिए जाते हैं।
