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दिल्ली के रसोईघर में मिथिला का भोजन

यह प्रविष्टि अस्थायी है और प्रबंध समिति की पुष्टि शेष है।

भोजन 8 मार्च 2026

भोजन वह चीज़ है जो घर छोड़ने के बाद सबसे अंत तक बची रहती है। भाषा छूट सकती है, पहनावा बदल जाता है, पर रसोई देर तक वैसी ही रहती है।

दही चूड़ा मिथिला का सबसे जाना पहचाना भोजन है। चूड़ा, यानी चिवड़ा, दही और गुड़ या चीनी के साथ खाया जाता है। मकर संक्रांति के दिन यह लगभग हर घर में बनता है। इसमें पकाना कुछ नहीं है, इसलिए यह पहली चीज़ है जो बच्चों को सिखाई जा सकती है।

तिलकोर की सब्ज़ी और तिलकोर के पत्ते का तरुआ मिथिला की अपनी चीज़ है। बड़ी, यानी दाल से बनी सूखी गोलियाँ, सब्ज़ी में डाली जाती हैं और लंबे समय तक रखी जा सकती हैं। सत्तू गर्मी में पानी में घोलकर पिया जाता है और भरवाँ लिट्टी में भी पड़ता है।

मछली और भात मिथिला के भोजन का सामान्य हिस्सा है और इसे शुभ माना जाता है। जो परिवार मांसाहार नहीं करते, उनके यहाँ भी विवाह के समय मछली का प्रतीकात्मक उपयोग होता है।

दिल्ली में चूड़ा, सत्तू, बड़ी और मखाना बिहार और पूर्वांचल का सामान बेचने वाली दुकानों पर मिल जाते हैं। कई परिवार गाँव से आने वाले किसी परिचित के हाथ यह सामान मँगा लेते हैं, जो अब भी सबसे भरोसेमंद तरीका है।

जिस घर में बच्चे ने कभी चूड़ा नहीं देखा, वहाँ शुरुआत मकर संक्रांति से करना सबसे आसान है। एक दिन का भोजन याद रह जाता है, समझाया गया पाठ नहीं।