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अरिपन और मधुबनी: आँगन की रेखाएँ

यह प्रविष्टि अस्थायी है और प्रबंध समिति की पुष्टि शेष है।

अरिपन और मधुबनी 5 जुलाई 2026

अरिपन ज़मीन पर बनाया जाने वाला चित्र है। चावल पीसकर उसका घोल बनाया जाता है, उसमें उँगली डुबोकर आँगन या पूजा के स्थान पर रेखाएँ खींची जाती हैं। इसे बनाने के लिए ब्रश नहीं, उँगली ही काम आती है।

बनाने का ढंग निश्चित है। पहले बिंदु रखे जाते हैं, फिर उन बिंदुओं को रेखाओं से जोड़ा जाता है। इसी कारण अरिपन में सब कुछ सम रहता है और आकृति चाहे जितनी बड़ी हो, अनुपात नहीं बिगड़ता। जो लोग इसे सजावट समझते हैं, वे यह नहीं देखते कि इसके नीचे एक ज्यामिति है।

अरिपन हर अवसर के लिए अलग होता है। सरस्वती पूजा, छठ, विवाह, उपनयन और गोसाउनि घर की पूजा, सबके अपने रूप हैं। यह स्थायी नहीं होता। पूजा के बाद धुल जाता है, और अगली बार फिर बनाया जाता है।

मधुबनी चित्रकला, जिसे मिथिला चित्रकला भी कहते हैं, इसी परंपरा का दूसरा रूप है। पहले यह विवाह के कमरे की दीवार पर बनती थी, जिसे कोहबर कहते हैं। उसमें कमल, बाँस, मछली, सूर्य और तोता बार बार आते हैं, और हर आकृति का अर्थ होता है।

बाद में यही चित्रकला काग़ज़ और कपड़े पर आ गई और उससे कई परिवारों की आजीविका जुड़ी। दीवार से काग़ज़ पर आने से इसका रूप बदला, पर रेखा का ढंग वही रहा: पतली, दोहराई हुई और भरी हुई।

घर पर बच्चों के साथ शुरुआत करनी हो तो अरिपन आसान है। काग़ज़ पर पहले बिंदु लगवाइए, फिर उन्हें जुड़वाइए। जो बच्चा एक बार बिंदु से आकृति बनते देख लेता है, वह इसे भूलता नहीं।